जेठान पर्व की महत्ता

जेठान पर्व की महत्ता

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कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के एकादशी को जेठान के रूप में मनाया जाने वाला पर्व है। यह बिहार में बडे़ उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन ईख (गन्ना) की खरीदारी जमकर होती है। जेठान के दिन मुख्य रूप से ईख को देवी-देवताओं पर चढ़ाया जाता है और गन्ना चुसने की परम्परा होती है। इस दिन भारत के अलग-अलग राज्यों में एकादशी भी मनाया जाता है। लेकिन बिहार में इस दिन जेठान के रूप में धूम रहता है।

जेठान पर्व के पीछे कथा संक्षिप्त में इस प्रकार है-

मगध की राजधानी राजगृह में महाराजा वृहद्रथ नाम के एक महाप्रतापी तथा धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। जिनका विवाह काशी नरेश की दो सुन्दर सुशील कन्याओं से हुआ था। महाराज वृहद्रथ ने यह वचन दिया था कि वह अपनी दोनों पत्नियों से बिना भेदभाव के समान रूप से लगाव रखेंगे। लेकिन वृद्धावस्था तक उनकी कोई संतान नहीं हुई। संतान के और उत्तराधिकारी के शोक के कारण राजा अपना राजपाठ त्याग कर सन्यास लेने का विचार लेकर जंगल की ओर चल दिये। जंगल में राजा बृहद्रथ महात्मा चण्डकौशिक के आश्रम में उनका शिष्य बनने के उद्देश्य से पहुँचे। राजा ने पूरी श्रद्धा से महात्मा की सेवा की। राजा की सेवा से प्रसन्न होकर महात्मा चण्डकौशिक ने शिव का ध्यान कर एक आम्र फल दिया। राजा बडे आश्चर्यचकित हुए क्योंकि उन दिनों आम का मौसम नहीं था। महात्मा ने फल देते हुए कहा कि ये फल अपनी पत्नी को खिला देना, इससे तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी। राजा अपने राज्य लौटकर सारी बातें रानियों को सुनाई और फल को आधा-आधा काटकर अपनी दोनों पत्नियों को खिला दिया। समय आने पर दोनों रानियों के गर्भ से शिशु के शरीर का आधा-आधा भाग पैदा हुआ। अशुभ और व्यर्थ समझकर राजा ने टुकडे को जंगल में फेंकने का आदेश दे दिया।

      भगवान शिव के वरदान को निष्फल होता देख माँ पार्वती को दुख हुआ और उन्होंने अपना 85वां अवतार माता जरादेवी के रूप में लेकर वन में प्रकट हुई। बच्चें को जंगल में रखकर जब दासियां जाने लगी तब जरामाता उपस्थित होकर दासियों को ठहरने का अनुरोध की। माँ जरामाता ने दोनों टुकड़ों को हाथ में लेकर अराध्य देव भगवान शंकर की अराधना करते हुए दोनों टुकड़े को आपस में जोड़ दी और बच्चें की कमर में लोहे की एक कील दे दी। टुकड़े आपस में जुडते ही बच्चा किलकारियाँ करने लगा। जरामाता ने बालक को दासियों को सौंपते हुए राजमहल में लौट जाने को कहा। दासियां जानती थी कि उनकी बात कोई नहीं मानेगा इसलिए सभी ने अनुरोध किया कि वे खुद चलकर बच्चे को सौंपे।

      माता ने उचित जानकर राजमहल पहुँची और राजा को बच्चा सौंपते हुए कही- राजन, यह आपका ही संतान है, मैंने अपने यश से इसे जोड़ दिया है, अब यह एक असाधारण और तेजस्वी बालक होगा। माता ने अपना परिचय वनदेवी के रूप में बताया।

      माता जरादेवी राजा से इजाजत लेते हुए वहाँ से जाने की बात कही, तब राजा और उनकी रानियों ने बहुत अनुरोध किया कि वे महल में ही रह जाएं ताकि राजा और रानियाँ उनकी सेवा में अपना जीवन समर्पण कर सकें। लेकिन जरादेवी ने अपनी जिम्मेदारियों की बात कहते हुए राजा को यह दिलासा दी कि वह समय-समय पर आकर बच्चें से मिलती रहेगी। यह कहकर देवी वापस जंगल में चली गयी। आज जरामाता को जरैयादेवी, बन्दादेवी या वनदेवी के नाम से भी जानी जाती है।

      राजा वृहद्रथ ने कहा कि आपके परोपकार और यश से ही मेरे पुत्र का पुनर्जन्म हुआ है इसलिए मैं अपने संतान का नाम आपके नाम पर ही रखूंगा। चूंकि जरा माता के द्वारा जोड़ा (संध) किया गया था इसलिए बालक का नाम जरासंध रखा गया। और यह घोषणा किया गया कि जरासंध का जन्मदिवस पर पूरे मगध तथा वृहद्रथ के सम्पूर्ण राज्य में इसे पर्व के रूप में धूमधाम से मनाया जाएगा। राजपुरोहितों के द्वारा इस दिन को और इस पर्व को “ज्योष्ठोत्थान” का नाम दिया गया। इस दिन जरामाता को वनदेवी के रूप में पुजा जाने लगा। इसी का अपभ्रंश है जेठान। इस दिन लोग ईख व अन्य फलों की पूजा पाठ करते हैं।

प्रजा जरासंध महाराज को जरासंधेश्वर कहा करती थी। वायु पुराण के “चतुर्थ राजगृह महामात्य” में ऐसा अंकित है कि “जरासंध के समान आज तक संसार में कोई धर्मात्मा राजा नहीं हुआ।”

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